अपनों ने भुलाया पर गैर दिलाते हैं मोक्ष
कानपुर , आज के भौतिकवादी समाज में जहां सामाजिक संबंध दरक रहे हैं वहीं परम्पराओं के पालन में भी उदासीनता देखी जा रही है, किसी व्यक्ति के निधन पर संपन्न होने वाले तेरह दिवसीय मरणोत्तर संस्कार अब कहीं कहीं पांच से सात दिन के बीच पूरे कर दिए जाते हैं, इसी प्रकार अब लोग कई बार अपने प्रियजनों का अस्थि कलश दो चार अथवा दस पंद्रह दिन कही रख कर अपनी सुविधा से उसे विसर्जित करने हेतु निकलना चाहते हैं, इन्हीं अस्थि कलशों को भैरो घाट पर पूर्ण सुरक्षा में रखने की व्यवस्था मनोज सेंगर द्वारा की गई है, उत्तर भारत की इस अनूठी स्थापना से हजारों लोग लाभान्वित हो रहे हैं, सेंगर बताते हैं कि
कम लोगों को ज्ञात होगा कि जिस प्रकार शारदीय नवरात्रि से पूर्व पितृपक्ष पड़ता है ठीक उसी प्रकार दिसंबर माह में गुप्त शारदीय पितृपक्ष आता है जिसमें साधक अपनी विशिष्ट साधनाएं करते हैं, उसी अवधि में प्रतिवर्ष जिन अस्थि कलशों का पूरे वर्ष कोई दावेदार नहीं आता उनका विधि विधान से भू विसर्जन कर दिया जाता है,
क्या है अस्थि कलश बैंक
अस्थि कलश बैंक विद्युत शवदाह गृह भैरोघाट में स्थित वह स्थान है जहां अपने दिवंगत स्वजन की अस्थियों को लोग कुछ समय रख
सकते हैं जिन्हें बाद में अपने इच्छित स्थान पर विसर्जन हेतु ले जा सकें,
अस्थि कलश बैंक की स्थापना वर्ष 2014 में देहदान अभियान प्रमुख मनोज सेंगर द्वारा की गई,
यहां बैंक के लॉकर जैसे बॉक्स बने हैं जिसमें अस्थि कलश रख दिए जाते हैं, समस्त व्यवस्था निःशुल्क है,
क्यों बच जाते हैं अस्थि कलश
इस अनूठे प्रकल्प के संस्थापक मनोज सेंगर बताते हैं कि भारतीय समाज में प्रायः कोई भी व्यक्ति अपने स्वजन के अस्थि कलश को छोड़ना नहीं चाहता परंतु कई बार परिवार में कोई बड़ी दुर्घटना होने अथवा किसी आपदा जैसे बाढ़ अथवा अग्निकांड की स्थिति में रखे हुए कलश की सुधि बिसर जाती है,
कई बार कुछ व्यक्तियों का दाह संस्कार मोहल्ले वाले मिल कर करते हैं ऐसी स्थिति में कलश रख तो दिया जाता है पर उसे लेने वाला कोई नहीं होता,
बचे हुए कलश आमतौर पर वही होते हैं जिनका कोई परिजन नहीं होता और पड़ोस के लोग विद्युत शवदाह गृह में संस्कार कर देते हैं,
इस प्रकार के अस्थि कलश जिन्हें लेने छः माह तक कोई नहीं आता उन्हें अलग रख दिया जाता है और वर्ष के अंत में उनका विधिवत भू विसर्जन कर दिया जाता है.
